Wednesday 19th of December 2018
“अखिलेश सरकार ने अखलाक लिंचिंग केस में मुझपर मीट के सैंपल बदलने का दबाव बनाया था”।
एक्सक्लूसिव

“अखिलेश सरकार ने अखलाक लिंचिंग केस में मुझपर मीट के सैंपल बदलने का दबाव बनाया था”।

उमेश पाटिल और असित दीक्षित |
December 5, 2018

बुलंदशहर की उन्मादी भीड़ के हाथों मारे जाने से कई महीने पहले, दादरी के अखलाक हत्याकांड में जांच अधिकारी रहे सुबोध कुमार सिंह ने कोबरापोस्ट से चौंकाने वाला खुलासा किया था


नई दिल्ली (बुधवार, 5 दिसंबर 2018): अभी दो दिन पहले बुलंदशहर में गौ रक्षकों की एक उन्मादी भीड़ ने सयाना के एसएचओ सुबोध कुमार सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी थी। अपुष्ट खबरों के अनुसार इस हत्यारी भीड़ में शामिल एक गौरक्षक ने कहा था “ये वही एसएचओ है”। इसके बाद भीड़ की मार से अधमरे पुलिस ऑफिसर को पॉइंट ब्लैंक रेंज से गोली मार दी गई। घटना के बाद मृतक अधिकारी के सर्विस रिवॉल्वर और उनका मोबाइल गायब पाये गए हैं। कथित गौरक्षक का ये कहना “ये वही एसएचओ है” कहीं 28 September 2015 को बुलंदशहर से कोई 35 किलोमीटर दूर हुए अखलाक हत्याकांड की ओर इशारा तो नहीं था। आपको बता दें कि इस दिन दादरी के बिसहाड़ा गाँव के अखलाक की उसी के गाँव वालों ने गोकशी के आरोप में हत्या कर दी थी। इस हत्याकांड की जांच का जिम्मा थाना जारचा में तैनात सुबोध कुमार सिंह को दिया गया था। सुबोध कुमार सिंह ने न सिर्फ गाँव में सांप्रदायिक सद्भाव कायम करने के प्रयास किए बल्कि इस हत्या में संलिप्त दस अभियुक्तों को गिरफ्तार कर केस को अपने तार्किक परिणीति तक पहुंचाने का भी प्रयास किया था। आगे चलकर कुल अट्ठारह अभियुक्त इस हत्याकांड में नामजद हुए थे। लेकिन इस केस में जांच पूरी होने से पहले करीब चालीस दिन के भीतर ही सुबोध कुमार सिंह का तबादला बनारस कर दिया गया था।

उत्तर प्रदेश पुलिस प्रशासन का यह फैसला चौंकाने वाला था। सभी की ज़ुबान पर यह यक्ष प्रश्न था: आखिर क्यों। बीच जांच सुबोध कुमार सिंह का तबादला होना, उसके बाद राज्य पशु-चिकित्सा विभाग द्वारा जारी प्रारंभिक रिपोर्ट में मौका-ए-वारदात से जब्त किए गए मीट को मटन बताया जाना और फिर मई 2016 में मथुरा फोरेंसिक साइन्स लैब द्वारा उसी मीट को गोमांस बताया जाना ये सब इस बात का संकेत थे कि जांच को प्रभावित कर एक दिशा में मोड़ने की कोशिश शासन-प्रशासन के ओर से की गई थी। आपको याद दिला दें कि तब राज्य में अखिलेश यादव की सरकार थी।

सरकार की ओर से मीट के सैंपल बदलने का दवाब था। जाहिर है सुबोध कुमार सिंह जानते थे कि ऐसा करना IPC की धारा 201 और 218 का उल्लंघन होगा। अगर वो ऐसा करते तो भारतीय कानून की नज़र में वो साक्ष्य मिटाकर अपराधी की सहायता करने के अपराधी बन जाते। अपने transfer की वजह बताने के बाद सुबोध कुमार सिंह ने कोबरापोस्ट को बताया कि दादरी-स्थित पशु चिकित्साधिकारी ने किस तरह अपनी रिपोर्ट को दवाब के चलते बदल दिया था। “नहीं pressure तो political pressure तो कुछ नहीं था political तो यह था कि इस meat को  जो जब समाजवादी पार्टी वाली सरकार थी वो यह चाहती थी हम लोगों को और डॉक्टर को यह भी दबाव बनाया गया कि इस meat को change कर दिया जाएकोबरापोस्ट रिपोर्टर ने उनसे एक बार फिर पूछा कि उन्हें समझ नहीं आया कि वो क्या कह रहे हैं लिहाजा वो हमें समझाएं कि उन्हें क्या करने के लिए कहा गया था। इसपर सुबोध कुमार सिंह ने दोबारा ये बात दोहराते हुए कहा कि “meat को change कर दिया जाए जो meat हमने मौके से लिया था उसकी जगह meat plant कर दिया जाए मतलब buffalo का  हमने तो मना कर दिया कि हम नहीं कर पाएंगे क्योंकि meat जो है तीन   एक जो घटनास्थल से meat लिया गया था उसके तीन jar बनते हैं एक थाने में रहता है, एक FSL चला जाता है, एक डॉक्टर के पास चला जाता है वो जा चुका था अगर हम change करते 201-218 के मुल्जिम हम होंगे

सुबोध कुमार सिंह ने जो कहा उससे जाहिर हो जाता है तत्कालीन राज्य सरकार रिपोर्ट बदलने के लिए सभी संबन्धित अधिकारियों पर दवाब डाल रही थी। बकौल सुबोध जब उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया तो उनका तबादला कर दिया गया था। सुबोध ने कोबरापोस्ट की टीम को बताया कि “असलियत यह है कि डॉक्टर से रिपोर्ट change कराई गई थी...buffalo डॉक्टर से।  हमारे दोबारा पूछने पर सुबोध ने कहा था कि डॉक्टर ने भी रिपोर्ट दी थी कि गाय का ही meat है प्रथम दृष्टिया जो रिपोर्ट दी जाती है..वो रिपोर्ट गाय के meat की ही दी थीहमने उनसे पूछा कि क्या आप original copy को बदलने की बात बता रहे हैं तो उन्होंने हमसे बताया कि “Original copy जिसमें डॉक्टर ने लिखा है कि  the meat of cow... मतलब … affected, रिपोर्ट को change किया उससे पहले मेरे पास भेज दी थी DM जो नागेन्द्र प्रताप सिंह DM थे उन्होंने रिपोर्ट उठाकर मुझे वापिस करा दी मैंने वो रिपोर्ट वापस कर दी लेकिन मैंने photocopy करवा ली डॉक्टर ने लिख कर दे दिया

सुबोध कुमार सिंह की बातों से साफ हो गया था कि रात के अंधेरे में इस मामले में ये सब हेराफेरी की गई थी। “रात को यह हुआ कि यहां भी change कराया गया meat लेकिन मैने change करने से मना कर दियाहमारे पूछे जाने पर कि कौन ऐसा कर रहा है तो सुबोध कुमार सिंह ने हमें बताया था कि “एक SDM, एक CO, डॉक्टर, FSL मथुरा भी आए थे उन्होंने meat को देने से मना कर दिया, हमारा Sub Inspector भी आया थाकोबरापोस्ट की टीम के ये पूछे जाने पर कि क्या सरकार चाहती थी कि meat गाय का साबित ना हो, सुबोध कुमार सिंह ने जवाब दिया कि उनको भी पता था हमसे भी पूछा था DGP साहब ने कि....तुम को क्या लगा प्रथम दृष्टया देख के खाल बरामद हो रही बैल की खाल बरामद हो रही है सफेद ... से बराबर  होता है कि गाय का है यह meat.... बोला इसको आनन-फानन में change कर दो तीसरे दिन change करवा रहे थे, 28 तारीख की बजाए 31 तारीख

इन सभी खुलासों से ये स्पष्ट होता है कि इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह ने किसी दबाव में आकर अपने आदर्शों और ईमानदारी से समझौता नहीं किया। कथित गौरक्षकों ने जिस तरह से एसएचओ सुबोध कुमार सिंह की दिन-दहाड़े हत्या की है वह अपने आप में बेहद ही शर्मनाक और चिंताजनक है। उनकी हत्या से पता चलता है कि सुप्रीम कोर्ट की हिदायतों की बावजूद गौरक्षकों पर मौजूदा सरकारें कोई लगाम नहीं लगा पा रही हैं। बल्कि इस दिशा में कोई इच्छाशक्ति नज़र ही नहीं आती। तभी खुद को गौ-रक्षक बताने वाली उन्मादी भीड़ ने एक कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार अधिकारी को चिन्हित करके दरिंदगी से उसकी हत्या कर दी। यह भी अपने आप में शर्मनाक है कि एक सेकुलरवादी सरकार भी ऐसे अधिकारी पर अपने मनमाफिक काम करने का दवाब डालती है और उसके न करने पर सज़ा के बतौर उसे दूर ट्रान्सफर कर देती है।  

कोबरापोस्ट ने गौतमबुद्ध नगर ज़िले के तत्कालीन डीएम नागेंद्र प्रताप सिंह से फोन पर बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होने सुबोध कुमार सिंह से जुड़े किसी भी मुद्दे पर बात करने से साफ इंकार कर दिया।

कोबरापोस्ट का यह खुलासा हमारी उस तहक़ीक़ात का हिस्सा है जो हमने कई महीने पहले देश में गाय के नाम पर हो रही हत्याओं पर शुरू की थी। इसके लिए हमारे रिपोर्टर उमेश पाटिल और असित दीक्षित ने फिल्म researcher के रूप में सुबोध कुमार सिंह से मुलाक़ात की थी। किसी कारण हमारी वह तहक़ीक़ात पूरी न हो सकी। इस खुलासे के पीछे हमारा एकमात्र यही उद्देश्य है कि सुबोध कुमार सिंह के साथ हुई नाइंसाफी की सच्चाई जग-जाहीर हो सके। हमें उम्मीद है कि मौजूदा सरकार इस खुलासे का संज्ञान लेते हुये मामले की तहक़ीक़ात कराएगी और अखलाक हत्याकांड में इस लीपा-पोती में शामिल अधिकारियों के खिलाफ समुचित कार्रवाई करेगी।


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