न्यायाधीशों को किसी से प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

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फाइल फोटो।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट और शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की निष्पक्ष नियुक्ति के लिए कार्यपालिका और न्यायपालिका से स्वतंत्र एक ‘सार्वजनिक संस्था’ बनाने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि न्यायाधीशों को किसी से प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है।

न्यायमूर्ति अरण के मिश्रा और न्यायमूर्ति यू यू ललित की पीठ ने कहा कि ‘‘हमें पृथ्वी पर किसी से प्रमाणपत्र की कोई जरूरत नहीं है।’’ पीठ की यह टिप्पणी तब आई जब यह आरोप लगाया गया कि हाई कोर्ट और शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद होता रहा है।

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पीठ ने ‘नेशनल लॉयर्स कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी एंड रिफॉर्म्स’ की इस दलील के साथ असहमति जताई कि उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कार्यपालिका और न्यायपालिका से स्वतंत्र एक संस्था की जरूरत है, क्योंकि न्यायाधीशों के चयन के लिए कॉलेजियम बड़ी संख्या में वकीलों में से कभी प्रतिभाशाली वकीलों के नाम पर विचार नहीं करता।

पीठ ने कहा कि ‘‘हम इसे खारिज कर रहे हैं। हमें इस याचिका में कोई तत्व नहीं दिखाई देता। आपके विचार अच्छे या बुरे हो सकते हैं, इस पर हम टिप्पणी नहीं कर रहे। लेकिन आप जो भी कह रहे हैं उसे कुछ संवैधानिक प्रावधानों को निष्प्रभावी किए बिना नहीं किया जा सकता।’’

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जब संगठन की ओर से वकीलों जे नेदुमपरा और ए सी फिलिप ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए केंद्र द्वारा मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) के हो रहे अध्ययन का जिक्र किया तो पीठ ने कहा कि ‘‘हम एमओपी पर टिप्पणी नहीं करेंगे। क्या प्रस्तावित एमओपी पर सवाल किया जा सकता है? इसे निश्चित आकार पाने दें। इसे आने दें, फिर हम देखेंगे।’’

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पीठ ने कहा कि इस तरह की इकाई बनाने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा जो शीर्ष अदालत नहीं कर सकती। वकीलों के संगठन ने दलील दी थी कि न्यायपालिका पर कथित रूप से संभ्रांत वर्ग के नियंत्रण को समाप्त करने के लिए न्यायाधीशों के चयन की एक स्वतंत्र संस्था जरूरी है।

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