संविधान पीठ करेगी विचार: क्या सुप्रीम कोर्ट को RTI से हासिल है छूट

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फोटो: साभार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को संविधान पीठ के पास भेज दिया है, जिसमें सवाल उठाया गया है कि क्या शीर्ष अदालत को सूचना का अधिकार कानून(आरटीआई) के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति और अन्य मामलों पर सूचना का खुलासा करने से छूट हासिल है।

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मुद्दे को इस आधार पर बड़ी पीठ के पास भेज दिया कि इसमें विधि का प्रश्न शामिल है। पीठ ने कहा कि विधि का प्रश्न शामिल है, जिसकी व्याख्या करने की आवश्यकता है। पीठ में न्यायमूर्ति प्रफुल्ल सी पंत और न्यायमूर्ति ए एम खानविल्कर शामिल हैं।

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आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल की तरफ से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि समूचे मुद्दे की जड़ दिल्ली उच्च न्यायालय और केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश में है, जिसमें कहा गया था कि उच्चतम न्यायालय आरटीआई अधिनियम के दायरे में आता है और न्यायाधीशों की नियुक्ति और अन्य न्यायिक सूचनाएं देने के लिए बाध्य है।

उन्होंने कहा कि यह धारणा पैठ बनाती जा रही है कि न्यायपालिका अपनी व्यवस्था में मामलों का फैसला करने में विलंब की वजह से पारदर्शिता लाने से बच रही है। मामले की सुनवाई में विलंब का हवाला देते हुए भूषण ने कहा कि जब दूसरों की बारी आती है तो उच्चतम न्यायालय चुनावी उम्मीदवारों को भी अपनी संपत्ति का खुलासा करने का निर्देश देता है, लेकिन जब न्यायाधीशों की बारी आती है तो वह इससे बचने की कोशिश करता है।

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इसपर पीठ ने कहा कि क्यों कोई सवाल का जवाब देने से बचेगा। इसपर अदालत ने संविधान पीठ जिन मुद्दों की पड़ताल करेगी वे सवाल तैयार किए। इसमें यह सवाल भी शामिल है कि क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता की अवधारणा आरटीआई अधिनियम के तहत सूचना प्रदान करने पर रोक लगाने की मांग करती है और क्या सूचना का मांगना न्यायपालिका के कामकाज में हस्तक्षेप के समान है।

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शीर्ष अदालत ने नवंबर 2010 में कहा था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है।

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