भारतीय वैज्ञानिक हर रोज़ बनाते है साठ लाख तीस हज़ार लीटर खारे पानी को पीने लायक

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तमिलनाडू के कलपक्कम स्थित भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिको ने समुद्री खारे पानी को पीने लायक शुद्ध पानी में बदलने की अनोखी तकनीक विकसित की है। रिसर्च सेंटर में लगे पायलट प्लांट में न्यूक्लियर रिएक्टर से निकलने वाली बेकार भाप से समुन्द्र के खारे पानी को पीने लायक बनाया जा रहा है। प्लांट की क्षमता हर रोज़ करीब साठ लाख तीस हज़ार लीटर शुद्ध पानी बनाने की है। भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर में इन दिनों इसी पानी का इस्तेमाल भी हो रहा है।

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भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर, मुंबई के निदेशक के एन व्यास के मुताबिक, तमिलनाडू में इस पायलट प्लांट की सफलता के बाद पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल में भी ऐसे कई प्लांट लगाए गए है। निदेशक ने बताया कि संस्थान ने कई ऐसी झिल्लीयां तैयार की है जिनसे बहुत ही मामूली खर्च पर यूरेनीयम और आर्सनिक युक्त पानी को भी आसानी से साफ कर पीने लायक बनाया जा सकता है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल ही में रिसर्च सेंटर आकर साइकल में फिट किए गए इस वॉटर प्युरिफ़ाइर को चलाकर देखा। दरअसल ये प्युरिफ़ाइर बिना किसी बिज़ली के साइकल के पेडल से बनने वाली ऊर्जा से चलता है। देशभर में इन दिनों करीब 13 राज्य सूखे की चपेट में है। ऐसे में भारतीय वैज्ञानिको की ये पहल निश्चित तौर पर आने वाले दिनों में मील का पत्थर साबित होगी। इसी योजना में एक और कदम बढ़ते हुए वैज्ञानिको ने सूखाग्रस्त मराठवाड़ा में घरेलू इस्तेमाल के लिए कई किफ़ायती वॉटर प्युरिफ़ाइर भी बनाए है जिनकी काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।

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